सदाचार से मनुष्य को आयु, लक्ष्मी तथा इस लोक और परलोक
मे कीर्ति की प्राप्ति होती है । दुराचारी मनुष्य इस संसार मे लम्बी आयु नही पाता, अत: मनुष्य यदि अपना कलयाण करना व सुखमय जीवन जीना चाहता हो तो उसे सदाचार का पालन करना चाहिए ।
मनुष्य किताना ही बडा पापी क्यों न हो, सदाचार उस की बुरी प्रवृतियो को दबा देता है। सदाचार धर्मनिष्ठा तथा सच्चरित्र का लक्ष्ण है।
सदाचार ही कल्याण कर जनक और कीर्ति को बढानेवाला है,
इसी से आयु की बृद्धि होती है और यही बुरे लक्ष्ण को नाश करता है। सम्पूर्ण आगमो मे सदाचार को श्रेष्ठ बतलाया गया है। सदाचार से धर्म उत्पन्न होता है और धर्म के प्रबाव से आयु की वृद्धि
होती है। जो मनुष्य धर्म का आचरण करतें है और लोक कल्याणकारी कार्यो मे लगे रहते
है, उनके दर्शन न हुए तो भी केवल नाम सुनकर मानव समुदाय उनसे प्रेम करने लगते है।
जो मनुष्य नास्तिक, क्रियाहीन, गुरु और शास्त्र की आज्ञा का उलंगन करनेवाले, धर्म को न जानने वाले,
दुराचारी, शीलहीन, धर्म की मर्यादा को भंग करने वाले तथा दुसरो वर्ण की स्त्रियों से संपर्क रखने वाले है, वे इस लोक मे अल्पआयु होते है , मरने के बाद नरक मे पड्ते है और
सुखमय जीवन की कल्पना नही कर सकते ।ईष्या करने से, सूर्योदय के समय और दिन मे सोने से आयु क्षीण होती है। प्रतिदिन सूर्योदय से एक घंटा
पहले जागकर धर्म और अर्थ के विष्य मे विचार करें। मौन रह कर दंतधावन करें। दंतधावन किए बिना देवपूजा व संध्या न करें। सुबह सोकर उठने के बाद पहले माता-पिता, आचार्य तथा गुरुजनो को प्रणाम
करना चाहिए।
सूर्योदय होने तक कभी न सोये यदि किसी दिन ऐसा हो जाए तो प्रायचित
करें, गायत्री मंत्र का जप करें। उपवास करें या फलादि पर ही निभर्र करें । स्ननादि से निवृत हो कर प्रात:कालीन संध्या करें। नियमित त्रिकाल संध्या करने वालों को रोटी रोजी के लिए कभी
हाथ नही फैलाना पडता ऐसा शास्त्र वचन है। किसी भी वर्ण के पुरुष को परायी स्त्री
से संसग नही करना चाहिए। परस्त्री सेवन से मनुष्य की आयु जल्दी ही समाप्त होती है। इसके समान आयु को नष्ट करने वाला संसार मे दूसरा कोइ कार्य नही है। रजस्वला स्त्री के साथ कभी बातचीत
न करें।
नास्तिक मनुष्य के साथ कोइ प्रतिज्ञा न करें । आसन को पैरों से खिंचकर
या फटे आसन पर न बैठें। रात्री के समय हो सके तो स्नान न करें। स्नान के बाद तेल अदि की मालिश न करें यदि करनी हो तो स्नान से पहले करें। गीले कपडे न पहने।
जुठे मुँह पढना लिखन, शयन करना, मस्तिष्क पर स्पर्श करन कदापी उचित नही है। यमराज कहते हैं कि जो मनुष्य जुठे मुँह उठकर दौड्ता है और स्वाध्याय करता है,
मै उसकी आयु नष्ट करता हूँ । और उसकी संतानो को भी छीनता हुँ ।
एक चुप! सौ सुख
दूसरों की निंदा, बदनामे और चुगली कदापि न करें और नीचा न दिखायें । निंदा करन अधर्म बताया गया है, इसलिए दूसरो की और अपनी भी निंदा नही करनी चहिए। क्रूताभरी बातें न बोलें जिसके
कहने से दुसरो को उद्धेग होता हो, वह रुखाई से भरी हुइ बात नरक मे ले जाने वाली होती है। उसे कभी मुँह से न निकालें। बाणो से बिंदा हुआ और फरसे से काटा हुआ वन पुन: अंकुरित हो जाता है,
किन्तु दुर्वचन रुपी शस्त्र से किया हुआ भय़ंकर घाव कभी नही भरता।
खुशी जैसी
खुराक नही और चिंता जैसा कोइ गम नही! हरीनाम, रामनाम, और ओंकार के आचरण से बहुत सारी बिमारियां मिटती है, रोग प्रतिकारक शक्ति बढ्ती है, विकार क्षीण होते हैं, चित का प्रसाद बढता है
एव आवश्यक योग्यताओ का विकास होता है। मनमे बसे बुरे विचारों का नाश होता है, मन की शुद्धि होती है और आत्मविश्वास बढता है।
सब रोगों की एक दवाई, हँसना सीखो! दिन के शुरुआत मे २० मिनट तक हँसने से आप तरोताज़ा एंव उर्जा से भरपूर रहेंगें। हास्य आप का आत्मविश्वास
बढ्ता है, बहुत सारी बिमारियों का नाश होता है, रोगो से लडने की क्षम्ता प्रदान करता है, मन प्रसन्न रहता है कार्यो मे जी लगने लगता है। जो दिल के पुराने रोगी हो, जिनके फेफडे रोगग्रस्त
हो, क्षय रोग के मरीज़ हो, गर्भवती महिला, जिसने पेट का आँप्रेशन कराया हो व हार्ट के मरीज को ठाहके लगा कर नही हँसना चाहिए।